बाबा नीब करौरी
......कुछ वर्ष यह मंदिर यूँ ही विना मूर्ती (विग्रह) के ही रहा। परन्तु वर्ष 1981 कि वसंत पंचमी के पवन पर्व में इस मंदिर में महाराज जी की मूर्ती की स्थापना हो गयी। यहाँ मूर्ती को देखकर भी कैची धाम जैसी प्रारंभिक भावना आने लगी कि महाराज जी कि मुखमुद्रा से इसका सामंजस्य नहीं बैठता। पर अपनी मूर्ती स्वयं गढने बाले” महाराजजी का वही चमत्कार यहाँ भी उसी प्रकार स्पष्ट होने लगा!! शीघ्र ही कुछ ही अंतराल के उपरांत में बिना किसी भ्रान्ति स्पष्टरूप से द्रस्तिगोचार हुए, मूर्ती के मुख मण्डल में महाराजजी कि मुखमुद्रा स्वरुप लेने लगी और अब तो महाराजजी का ही प्रतिरूप हो चली है- प्रसंन्नमुद्रा युक्त to be continue....
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