बाबा नीब करौरी
Contin...श्री महाराज जी सदैव वसुधैव कुटुंबकम् में विश्वास रखा करते थे। सम्पूर्ण विश्व उनका घर था | सभी प्राणी उनके बच्चे जैसे थे। महाराज जी ने ११ सितंबर सन् १९७३( भाद्र शुक्ल पक्ष अनन्त चतुर्दशी) के दिन भगवान श्री कृष्ण की लीलास्थली श्री वृंदावन धाम में पूर्व नियोजित योजना के अनुरुप महासमाधि ले अपनी भौतिक लीलाओं को विराम दे दिया।
यद्यपि महाराज जी ने भौतिक रूप से भले ही समाधि ले ली हो, परन्तु वह आज भी सैकड़ों घटनाएँ ऐसी है कि वे अपने भक्तों को जब जब कष्टों या आपदाओं से घिरा देखते हैं तो सहज ही किसी न किसी रूप में दौड़े चले आते है। आज भी वे उसी तरह अपने भक्तों की रक्षा करते हैं जैसे अपने जीवन काल में किया करते थे ।
महाराज जी के समकालीन एवं आज के सभी संत तथा विद्वान उन्हें साक्षात् हनुमान जी का ही अवतार मानते हैं, वह आज भी जीवित हैं और सदा जीवित रहेंगे।
महाराज जी कहते हैं कि "तुम हमसे प्रेम करते हो तो हम भी तुमसे प्रेम करते हैं तभी हम तुमसे मिलते हैं।
महाराज जी कभी किसी भी प्रकार के आडंबर में विश्वास नहीं करते थे। महाराज जी ने कभी भी भाषण या प्रवचन नहीं दिया। इसे वह भाषा का खिलवाड़ मानते रहे। आग्रह करने पर भी आप यह कहकर टाल देते कि हम पढ़े लिखे नहीं हैं। इस प्रकार उन्होंने जन समुदाय के बीच रहते हुए आज के आधुनिक वातावरण मैं मानवता के उच्च मूल्यों को स्वयं आपने आचरण के द्वारा स्थापित किया ओर उन्हें व्यावहारिक रूप दिया जिससे लोगों मैं जागृति उत्पन्न हुई । उनके द्वारा प्रस्तुत आचरण एवं व्यवहार शिक्षाप्रद ही नहीं वरन जन साधारण के अनुकरण करने योग्य है To be continue...
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