बाबा नीब करौरी

सन् १९४० के पश्चात आपने अपना अधिकतर समय नैनीताल क्षेत्र एवं वृंदावन में व्यतीत करना आरम्भ कर दिया। सन् १९५० में महाराज जी ने हनुमानगढ़ी में श्री हनुमान जी के मंदिर की स्थापना की। उसके पश्चात लगभग दो दशकों में आपने अनगिनत मंदिरों एवं आश्रमों की स्थापना की जिनमें  नीब करौरी , भूमियाँधार, कैंची , वृंदावन , काकड़ीघाट , कानपुर , लखनऊ , दिल्ली , शिमला आदि प्रमुख हैं।
सन् १९५० से लेकर अपनी महासमाधि तक वे कभी भी एक स्थान पर अधिक समय तक नहीं रहे। अपनी ख्याति और यश के प्रति सदा उदासीन श्री महाराज जी ने इन मंदिरों और आश्रमों में कहीं अपना नाम नहीं आने दिया । सभी मंदिरों और आश्रमों को हनुमान जी के नाम से निर्माण कराने के उपरांत उनकी समुचित व्यवस्था कर विभिन्न स्थानीय न्यासों को सोंपते चले गये। सर्वथा अपने को तटस्थ रखते हुए उन्होंने यह महत्कार्य किया । आश्रमों का विस्तार तो उनके भक्तों ने आपकी महासमाधि के पश्चात किया और मंदिरों एवं आश्रमों से श्री महाराज जी का नाम भी इसी श्रद्धा और विश्वास की भावना से जुड़ गया।
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