बाबा नीब करौरी

महाराज जी की लीला क्रीड़ाओं के मूल मैं उनका मुख्य उद्देश्य केवल सीमित रूप में सीख देना अथवा मार्गदर्शन करना भर होता था  न कि गुरु रूप में कोई उपदेश देना , ओर न ही कभी उन्होंने इन सीखों को अनिवार्य रूप से किसी को मानने के लिये बाध्य किया । भक्त की स्वेच्छा ही सर्वोपरि थी। महाराज जी का तो यही भाव तहत था कि
    धीरे धीरे से मना , धीरे धीरे सबक़छू होय ।
   माली सींचे सौ घड़ा , रितु आये फल होय ।।
और मंत्र मूलं गुरुर्वाकयम मानने वाले ही इन सीखों का भरपूर फायदा उठा पाते रहे हैं ।
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