बाबा नीब करौरी
कैंचीधाम में एक भक्त श्री शिव गोपाल तिवारी से जब महाराज जी ने रामायण सुनाने के लिए कहा तो उन्होंने स्वाभाविक तौर पर पूछ ही लिया , " कहाँ से सुनाऊँ ?" तब महाराज जी न मालूम किस भवसागर में गोता लगाये हुए थे कि बोल उठे , " जहाँ से हमने विभीषण से कही थी ....." और तभी वे प्रक्रस्थित हो उठे !!!! फिर भी पकडे तो गए ही। जब इसी मगन भाव से तिवारी जी यह प्रसंग सुनाने लगे तो महाराज जी पुनः उसी भाव सागर में जा डूबे और शीघ्र ही भावावेश में आगये। महाराज जी उठकर खड़े हुए और दादा मुखर्जी का सहारा लेकर कमरे से बाहर आगये तब भी उनका दादा के कंधे पर रखा हाथ भारी होता चला गया यहाँ तक कि दादा के लिए उसका वजन असहनीय हो गया दादा ने जब मुड़कर महाराज जी कि तरफ देखा तो पाया कि उनका शरीर विशाल वानर रूप में परिवर्तित हो गया था। यह देखकर दादा अर्धचेतन अवस्था में दूर जंगल में भाग गए साथ में ही महाराज जी भी मंदिर परिसर छोड़कर दूर चले गए। कुछ समय पश्चात महाराज जी तो प्रकट हो गए परन्तु दादा महाराज जी द्वारा काफी खोजबीन के उपरांत ही वापस आ पाये।
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