बाबा नीब करौरी
महाराज जी आवश्यकतानुसार न केवल अपना वज़न घाटा बड़ा लेते थे , वरन मोटे पतले भी हो जाते थे।एक ऐसी ही घटना उस समय हुई जब एक बार वे अपनी महिला भक्त श्रीमती विद्या साह के यहाँ गये। श्रीमती विद्या साह का घर बाज़ार मैं था ओर काफ़ी संकरी सीड़ियों पर चढ़ कर जाना होता था। महाराज जी का डील डोल देखकर वे सोचतीं थी कि महाराज जी उनके घर की सीढ़ियाँ कैसे चढ़ पायेंगे। उनकी मनोभाव समझ कर महाराज जी एक दिन स्वयं बोल उठे की, " हम तेरे घर आयेंगे तू हवन करवाना।" श्रीमती साह ने एक पुजारी से हवन कराया। पूर्ण आहुति के बाद वे प्रासाद लेकर जब घर आ रहीं थी कि रास्ते मैं एक दुबला पतला साधु उनके पीछे लग गया। उन्हें लगा कि वह साधु उनका पीछा कर रहा है। उनको कुछ मानसिक परेशानी भी हुई। जल्दी जल्दी चलते हुए वे अपने घर के पीछे पहुँच गयीं ओर पीछे के रास्ते से उपर की मंज़िल पर पहुँच गयीं। यह रास्ता एक पंजाबी परिवार के घर से होता हुआ जाता था। श्रीमती साह तो चली गयीं परंतु जब वो साधु जाने लगा तो पंजाबी परिवार ने उसे डाँट कर भगा दिया। इस घटना के कई महीनों के बाद एक दिन श्रीमती साह जब महाराज जी से मिली तब उनके मन में विचार आया कि एक बार महाराज जी ने घर आने के लिए कहा था उन्होंने उनके कहे अनुसार हवन भी कराया पर महाराज जी नहीं आए इस उठते हुए विचार को महाराज जी ने जान लिया ओर बोले " हम तो आए थे , पर तेरे यहाँ पंजाबिन ने भगा दिया।" श्रीमती साह को बहुत ही ग्लानि हुई कि वह दुबले पतले साधु के स्वरूप में महाराज जी को न पहचान सकी ओर फलस्वरूप स्वागत भी नहीं कर सकी।
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