बाबा नीब करौरी

एक दिन पचास साठ कोंग्रेसी नेताओं का दल महाराज जी के दर्शन करने के लिए आ रहा था। महाराज जी हनुमान मंदिर  में रुके हुए थे वहाँ से दूर तक सड़क का रास्ता दिखाई दे रहा था। यह दल आता हुआ दूर से दिखाई दे गया। महाराज जी वहाँ से एकाएक उठे ओर पहाड़ी से नीचे उतर आये। एक भारतीय साधु और रामदास को साथ लेकर पैदल ही देवी मंदिर तक चले गये। जब वह दल वहाँ पहुँचा तो उन्होंने लोगों से महाराज जी के बारे में पूछा जिस रास्ते महाराज जी पहाड़ी से उतरे थे उन्होंने उधर ही संकेत कर दिया। यह दल उसी रास्ते पर चल पड़ा। महाराज जी ओर रामदास देवी के चबूतरे पर ठीक सामने विराजमान थे। वे लोग महाराज जी से मात्र छह फ़ीट की दूरी पर थे परंतु महाराज जी को नहीं देख पा रहे थे आपस में ही बात कर रहे थे की महाराज जी कहाँ है ? जबकि महाराज जी उनकी आँखों के सामने विराजमान थे। उन्होंने स्वयं अपने आपको ओर रामदास को उनकी आँखों से ओझल कर रखा था। रामदास को उस समय काफ़ी ज़ोर से खाँसी आ रही थी पर वह बमुश्किल उसे रोके हुआ था की उनको मालूम न पड़ जाए यह देख कर महाराज जी बोले वह बिना चिंता किए ख़ूब ज़ोर से खाँसो। तब जाकर रामदास को राहत मिली। अन्तत: कांग्रेसी दल बिना दर्शन किये ही वहाँ से लौट गया। उसके बाद महाराज जी फिर प्रकट हो गये।
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