बाबा नीब करौरी


सरदार रणजीत सिंह चालक उत्तर प्रदेश परिवहन निगम जिन्होंने 30 जून 1983 से अवकाश ले लिया है , बरेली और गनई के बीच बस चलाया करते थे। आप बताते है कि उनकी गाड़ी सदा कैंची हो कर जाया करती थी। कैंची आश्रम और मंदिर दोनों ही उनके सामने बने। दर्शनार्थियों की भीड़ लगी रहती थी पर वे कभी उतरकर दर्शन करने नहीं गए। एक बार वो जब आश्रम के सामने से जा रहे थे तो आश्रम के सामने काफी भीड़ लगी हुई थी मालूम पड़ा कि महाराज जी आये हुए है। यात्रियों की असुविधा के विचार से आपने आपने आपको लाचार पाया। वे स्वयं को समझाने लगे की सिद्ध महात्मा भगवान के ही रूप होते है और यदि बाबा सिद्ध है तो उनके मन की बात जानकर कभी न कभी स्वतः ही दर्शन देंगे। दुसरे ही दिन प्रातःकाल जब उनकी बस जा रही थी तो महाराज जी आश्रम के पास एक मोड़ पर अकेले ऐसे ही खड़े थे जैसे उनका इंतज़ार कर रहे हों। उन्होंने तुरंत गाड़ी से उतरकर प्रणाम किया । महाराज जी ने पूछा , " कहाँ जा रहा है ? " और उनके उत्तर दिए बिना ही कहने लगे , " साधू लोगों को परेशान नहीं किया करते , समझे ? " सरदारजी ने अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी।
श्री बाबा नीब करौरी आश्रम वृन्दावन
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