बाबा नीब करौरी

एक बार मकर संक्रान्ति की पूर्व संध्या में महाराज जी कामता प्रसाद दीक्षित जी के यहाँ कानपुर पहुँचे ओर दूसरे दिन उन्हें साथ लेकर प्रयाग के लिए रवाना हुए। वे लोग लगभग चार बजे प्रातःकाल रवाना हुए, उस समय एसा घना कुहरा छाया हुआ था कि कार से कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। दीक्षित जी सुझाव के तौर पर बोले अभी चार भी नहीं बजा है, अच्छा होता कि कुछ समय कानपुर मैं ही बिता दिया जाता। महाराज जी चुप्पी साधे रहे ओर गाड़ी लगभग दो किलोमीटर निकल गयी। रास्ते में चाकरी के पास महाराज जी ने एकाएक गाड़ी बंगले मैं ले जाने का आदेश दिया। जैसे ही गाड़ी फाटक के भीतर पहुँची, श्री हीरा लाल  [ हब्बा जी ] बाहर आकर उनका स्वागत करने लगे। हब्बा जी जी प्रेम ओर आनंद से विभोर हो कहने लगे, "महाराज जी !!! मैं उठ कर अभी अभी आपको ही याद कर रहा था। मन मैं इच्छा हो रही थी कि आपके दर्शन हो जाते।"
श्री बाबा नीब करौरी आश्रम वृन्दावन
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