बाबा नीब करौरी

महाराज जी की आज्ञा थी कि नीब करौरी गांव के मेले में  कोई चोरी नहीं करेगा , दुकानों में ताला नहीं लगाएगा रात को भी नहीं । एक माह के इस मेले में सैकड़ो आदमियों की भीड़ भाड़ में भी कोई चोरी चपाटी नहीं होती थी । रात में भी सारा सामान यू हीं पड़ा रहता था । एक दिन एक व्यक्ति लालच में आकर एक दूकान से बड़ा तरबूज उठा ले जाता है बिना बताये । महाराज जी से यह चोरी कहाँ छुप सकती थी । गाँव से पटरी पार जाते हुए उसके पांव रेल की पटरी पर ही चिपक जाते है । लाख प्रयास करने पर भी वह अपने आपको मुक्त नहीं कर पाता । वह व्यक्ति बहुत घबरा जाता है इधर गाड़ी आने का भी समय हो जाता है । अंत में वह बड़े ही दीन भाव से महाराज जी जी से याचना करता है । महाराज जी उसकी दीन पुकार सुनकर कुछ आदमीयों को यह सन्देश लेकर भेजते है कि , " अब पूरा तरबूज वहीँ बैठकर अकेले बैठ कर खाओ , और वादा करो कि अब चोरी नहीं करोगे । " मरता क्या न करता । उसने महाराज जी के द्वारा भेजे गए आदमियों के सामने पूरा तरबूज बड़ी मुश्किल से उदरस्थ किया और आगे से चोरी न करने का वादा किया । तभी एकाएक उसके पांव पटरी से छूट गए !!!!
शायद अन्य लोगों को सबक सिखाने के लिए महाराज जी ने यह लीला रची ।
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