बाबा नीब करौरी

मैं महाराज जी से काफ़ी समय से मिलना चाह रहा था पर उनको पकड़ नहीं पा रहा था । आख़िरकार मेरा एक दोस्त अपनी ऑफ़िस की कार मैं मुझे लेकर एक घर की तरफ़ जहाँ महाराज जी रुके हुए थे चल पड़ा। वहाँ पर चार कमरे थे, महाराज जी दूर वाले कमरे मैं रुके हुए थे। जैसे ही मैंने दर्शन के लिये कमरे मैं पैर रखा महाराज जी बोले, " तुम बाहर जाओ ?"
मैं बाहर आ गया परंतु मैं वहाँ से नहीं गया बाहर आ कर बैठ गया।बाहर आकर मैं घंटों बैठा रहा । काफ़ी देर बाद जब मेरा दोस्त बाहर आया ओर वह कर की तरफ़ बढ़ने लगा क्योंकि वह कार उसे छोड़नी थी। यद्यपि मेरा घर वहाँ से दूर था परंतु मैंने वहीं रुकने का निश्चय किया कि महाराज जी के दर्शन कर के ही जाऊँगा। अंत मैं कुछ लोगों को मुझ पर दया आ गयी वे मुझसे बोले तुम ये ठीक नहीं कर रहे हो अब की बार जब भी कुछ लोग अंदर जायें तो तुम उनके साथ चले जाना। यदि महाराज जी फिर बाहर निकल दें तो अगले भक्तों के साथ अंदर जाने की कोशिश करना। मैंने ऐसा ही किया महाराज जी ने मुझे दो बार बाहर कर दिया आख़िरकार तीसरी बार मैं महाराज जी बोले, " यहाँ आओ बैठो। तुम्हारा नाम क्या है ? तुम क्या करते हो ? फिर बोले ठीक है जाओ। " परंतु मैंने कहा, " मैं नहीं जा रहा हूँ। मैंने अभी तक आपके अच्छी तरह दर्शन भी नहीं किये। मैं आपसे अपनी परेशानी कहना चाहता हूँ। "महाराज जी बोले, " अभी जाओ। कल सुबह छः बजे आना। " उसके पश्चात मैं वापस आ गया। मुझे रात भर नीद नहीं आयीं ओर मैं दो बजे ही उठ बैठा ओर मैंने अपनी पूजा समाप्त की मुझे यह डर था की महाराज जी मेरे जाने से पूर्व कहीं चले न जाएँ।मैं जब वहाँ छः बजे पहुँचा तो महाराज जी वहाँ से जा चुके थे परंतु वे यह कह कर गये थे की वे लौट कर आएँगे। कुछ समय पश्चात जब महाराज जी लौट कर आये तो मैंने महाराज जी के साथ घंटों व्यतीत किए वास्तव मैं उस दिन के बाद से मैं सदा महाराज जी के साथ रहा।
रामदास।
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