नीब करौरी बाबा
महाराज जी जब अपने भक्तों के साथ जब ट्रेन से काशीपुर से हल्द्वानी आ रहे थे। तब उसी कक्ष मैं एक मुसलमान एक फल की टोकरी लेकर उसे हल्द्वानी जाकर बेचने के लिए चढ़ता है। भक्त जन उस कक्ष मैं महाराज जी के समक्ष भजन कीर्तन कर रहे थे। वह फल वाला महाराज जी के दर्शन कर मंत्रमुग्ध सा हो जाता है ओर महाराज जी के चरणों मैं आ बैठता है। कीर्तन समाप्त होने पर वह फलों की टोकरी महाराज जी को अर्पण कर देता है। महाराज जी प्रसाद स्वरूप सभी भक्तों मैं वह बाँट देते है। अंत में जब महाराज जी उसके सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद देते है तो उसके आनंद की कोई सीमा नहीं रहती है। उसके नेत्र संजल हो उठते है ओर कंठ रूँध जाता है। वह अपनी सुध बुध ही भूल बैठता है।
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