बाबा नीब करौरी


इस शताब्दी के चौथे दशक के बाद आपने नैनीताल को अपनाया। आप नैनीताल आते जाते रहते , परन्तु स्थाई रूप से वहां नहीं रहते थे। इस नगर के सभी लोग आपके भक्त हो चले थे और जब भी आप इधर आते लोग अपने घरों और दुकानो से उठकर मंत्र मुग्ध होकर आपके पीछे पीछे चलने लगते। रास्ता चलता आदमी भी अपना काम छोड़ देता था। महाराज जी जिस घर में भी चले जाते उस घर मैं उल्लास छा जाता था जिसका वर्णन नहीं हो सकता। महाराज जी इस नगर में अमुक समय कहाँ पर होंगे यह खोजने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी। आप  जहाँ भी होते उस स्थान की छटा स्वतः आपकी उपस्थिति का द्योतक होती थी। महाराज जी कभी कभी किसी भक्त की घर पर भी ठहर जाते थे परन्तु अधिकतर आप मनोरा नाम की निर्जन पर्वत पर या उसके पास सड़क की दीवारों पर रात बिता देते थे। इस प्रकार आप इस पर्वत को अपना अपनत्व देते रहे । गृहस्थ की सुख सुविधाओं की अभ्यस्त  यहाँ के भक्त जन इस स्थान पर आपके साथ रात रात भर जागते रहते और इसके पश्चात उनके दैनिक कार्यों में  किसी प्रकार की भी शिथिलता नहीं आती थी, अपितु वे नवीन स्फूर्ति   का अनुभव करते थे।
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