बाबा नीब करौरी


प्रसाद के प्रति महाराज जी के बहुत ही उत्कृट भाव थे विशेषकर आश्रमों में भोग लगाने के उपरांत वितरित प्रसाद के प्रति । एक रात कैंची धाम में टहलते हुए उन्हें प्रांगण में प्रसाद की एक पूरी पड़ी मिल गयी । उसे देख कर महाराज जी का मन अत्यंत दुखी हो गया कि प्रसाद का इस तरह अपमान - दुरुपयोग किया गया है ।
महाराज जी पूरी को उठाकर स्वयं खाने लगे ओर कहने लगे , " यह प्रसाद है ,यह धर्म की चीज़ है , धर्म के लिए गए धन से बनी है । कैसी बर्बादी करने लगे हैं लोग धर्म की चीज़ की । "
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