बाबा नीब करौरी
बाराबंकी शुगर मिल व्यवस्था बिगड़ने के कारण यू पी की तत्कालीन श्री चंद्र भान गुप्त की सरकार उसका अधिग्रहण करना चाहती थी । कानपुर के श्री देव कामता दीक्षित उसके संचालकों में से एक थे। गन्ना उत्पादकों की इक्षा के कारण सरकार को श्री दीक्षित जी को ही उसका रिसीवर बनाना पड़ा। दीक्षित जी को इस कार्य के लिए काफ़ी बड़ी धनराशि जुटानी थी। सेंट्रल बैंक बाराबंकी ने उसकी आपूर्ति करने में अपनी असमर्थता ओर उन्हें चेयरमेन की अनुमति प्राप्त करने की सलाह दी। अतः उन्होंने चेयरमैंन से जो कि बम्बई में थे मिलने कहा निश्चय किया। समय बहुत ही कम था। आपने दिल्ली से बम्बई विमान से जाने का निश्चय किया और इस कार्य की सफलता हेतु आपने वृंदावन आकर महाराज जी का आशीर्वाद लेना चाहा। जब आप वृंदावन पहुँचे तो ज्ञात हुआ कि महाराज जी दो घंटे पूर्व ही आश्रम छोड़ कर अन्यंत्र चले गए हैं। महाराज जी के दर्शन न होने से आपको बड़ा धक्का लगा। आप सोचने लगे अब काम नहीं बनेगा।
आपको हताश देख कर चौकीदार बोला," क्या आप कानपुर से आ रहे हैं ? " दीक्षित जी को यह सुनकर बड़ा ही आश्चर्य हुआ ओर आपके हामी भरने पर बोला, " महाराज जी जाते जाते यह कह गए हैं कि कह देना उसका काम बन जाएगा। वह वृंदावन के देवता बाँके बिहारी जी का प्रसाद लेता जाय।"
दोपहर का वक़्त हो चला था मंदिर बंद था, आपको प्रसाद की कोई आशा न थी ओर आपको दिल्ली भी तुरंत निकलना था। आपने माथा टेक कर बाज़ार से ही प्रसाद लेने का निश्चय किया जब आपने माथा टेका तो एक व्यक्ति अंदर से बाहर आता दिखाई दिया । आपने तुरंत भेंट के कुछ रुपए दिए ओर प्रसाद की याचना की। वह व्यक्ति भीतर जाकर एक बड़ी टोकरी प्रसाद आपको दे देता है। आप तुरंत टोकरी लेकर दिल्ली के लिए निकल जाते हैं ओर विमान द्वारा बम्बई पहुँचने के पश्चात सीधे मालाबार हिल्ज़ उनके घर पर पहुँचते हैं। वहाँ चेयरमैन साहब को न पाकर आप किसी अज्ञात प्रेरणा से वह बिहारी जी के प्रसाद की टोकरी अंदर भिजवा देते हैं। प्रसाद पाते ही उनकी पत्नी बाहर आ जाती हैं। वह एक गुजराती परिवार था काफ़ी दिनो से बिहारी जी जाने की सोच रहे थे परंतु व्यस्त होने के कारण नहीं जा पा रहे थे। अपने घर में ही बिहारी जी का प्रसाद पा कर आप द्रवीभूत हो गयीं ओर आपने उनसे सुबह आने को कहा। अगले दिन जब आप चेयरमैन साहब से जब मिले तो उन्होंने सारी बात सुनकर यथेष्ट आदेश जारी कर दिए कि आपको धनराशि शीघ्र उपलब्ध कराई जाय। महाराज जी की कृपा ने विषम परिस्थिति को भी अनुकूल बना दिया।
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