नीब करौरी बाबा
बद्रीनाथ यात्रा के पश्चात लौटते समय महाराज जी अपने परिकरों के साथ पंदूकेश्वर में विश्राम के लिए रुके । श्री गिरीश जोशी ख़ज़ांची थे वे कहे अनुसार थैली में से पैसे निकाल कर ख़र्च करते रहते थे उन्हें हिसाब किताब से कोई मतलब नहीं था। ओर न ही कभी जानने की कोशिश करते कि कितना बचा है। विश्राम के दौरान महाराज जी जोशी जी से बोले केवल पाँच रुपया बचा है । जोशी जी ने थैली मैं देखा केवल पाँच रुपए ही बचे थे । पर उन्हें क्या चिंता महाराज जी जाने।
महाराज जी जोशी जी से बोले , " जा , एक पत्थर ले आ। " पहाड़ों पर पत्थरों की क्या कमी पर महाराज जी की प्रेरणा से आपकी नज़र ऐसे पत्थर पर पड़ी जोकि आधा गड़ा हुआ था । जैसे ही जोशी जी उसे ताक़त लगा कर उखाड़ते है तो उसके नीचे उन्हें कई सारे नोट मिलते है। वे हर्ष पूर्वक उन्हें महाराज जी के पास ले आते हैं। उन्हें देखकर महाराज जी बाल सुलभ हर्ष के साथ बोलते हैं की , " लो बन गया काम , भगवान सबकी सुनते हैं । "
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