नीब करौरी बाबा

श्री महावीर सिंह जी, जो सन ४३-४४ में आगरा छावनी के अध्यक्ष थे, साधू संतों की सेवा एवं सत्संग के बड़े प्रेमी थे। वे उन दिनों जिगर के दर्द से काफ़ी पीड़ित थे। एक दिन आप कैंट स्टेशन पर वर्दी पहने घूम रहे थे तो एकाएक स्थूल  शरीर वाले व्यक्ति ने जो कि आधी धोती पहने ओर आधी ओढ़े थे, बड़ी आत्मीयता से बोले , " महावीर सिंह अब कैसी तबियत है ? "
आपने उत्तर दिया , " अब काफ़ी फ़र्क़ है । "
उसने फिर पूछा , " जिगर का दर्द कैसा है ? "
आप बोले , अभी थोड़ा थोड़ा है ।"
उस व्यक्ति ने कहा वह भी ठीक हो जाएगा । दोनो साथ साथ टहलते हुए जा रहे थे इतने में महावीर सिंह बोले माफ़ कीजिए मैंने आपको पहचाना नहीं । इस पर उस व्यक्ति ने उनके कंधे पर बड़े प्रेम से हाथ रखते हुए कहा , " हम बाबा नीब करौरी  हैं। " आपने महाराज जी का काफ़ी नाम सुन रखा था परन्तु इस समय वह उनकी आत्मीयता देख कर दंग रह गए। इतना  निकट सम्पर्क पा कर वह समझ न सके की क्या कहें  ओर क्या न कहें। वे एक दम हतप्रभ से रह गए । महाराज जी स्वयं बोले, " चलो , हम तुम्हारे घर चलते हैं। " इसके बाद दोनों घर पर आते हैं। इस घटना के पश्चात आप पर महाराज जी की प्रत्यक्ष कृपा सदा बनी रही । आप बताते हैं कि आपके बंगले के बाहरी तख़्त पर आसन लगा होता था। महाराज जी एक कम्बल बिछवाते ओर एक तकिया रखवाते ओर कभी आधे लेटे ओर कभी हाथों के सहारे बैठे हँस हँस कर घंटों इधर उधर की बातें किया करते थे। कभी दिन में सोते नहीं थे। कभी प्रवचन या भाषण जैसी बात नहीं किया करते थे। नहाने के बाद उन्हें कभी शरीर पोंछते नहीं देखा। धोती बदलते ही उनका शरीर सूख जाता था।
श्री महावीर सिंह जी , जो सन ४३-४४ में आगरा छावनी के अध्यक्ष थे , साधू संतों की सेवा एवं सत्संग के बड़े प्रेमी थे । वे उन दिनों जिगर के दर्द से काफ़ी पीड़ित थे। एक दिन आप कैंट स्टेशन पर वर्दी पहने घूम रहे थे तो एकाएक स्थूल  शरीर वाले व्यक्ति ने जो कि आधी धोती पहने ओर आधी ओढ़े थे , बड़ी आत्मीयता से बोले , " महावीर सिंह अब कैसी तबियत है ? "
आपने उत्तर दिया , " अब काफ़ी फ़र्क़ है । "
उसने फिर पूछा , " जिगर का दर्द कैसा है ? "
आप बोले , अभी थोड़ा थोड़ा है ।"
उस व्यक्ति ने कहा वह भी ठीक हो जाएगा । दोनो साथ साथ टहलते हुए जा रहे थे इतने में महावीर सिंह बोले माफ़ कीजिए मैंने आपको पहचाना नहीं । इस पर उस व्यक्ति ने उनके कंधे पर बड़े प्रेम से हाथ रखते हुए कहा , " हम बाबा नीब करौरी  हैं । " आपने महाराज जी का काफ़ी नाम सुन रखा था परन्तु इस समय वह उनकी आत्मीयता देख कर दंग रह गए । इतना  निकट सम्पर्क पा कर वह समझ न सके की क्या कहें  ओर क्या न कहें । वे एक दम हतप्रभ से रह गए । महाराज जी स्वयं बोले , " चलो , हम तुम्हारे घर चलते हैं । " इसके बाद दोनों घर पर आते हैं । इस घटना के पश्चात आप पर महाराज जी की प्रत्यक्ष कृपा सदा बनी रही । आप बताते हैं कि आपके बंगले के बाहरी तख़्त पर आसन लगा होता था । महाराज जी एक कम्बल बिछवाते ओर एक तकिया रखवाते ओर कभी आधे लेटे ओर कभी हाथों के सहारे बैठे हँस हँस कर घंटों इधर उधर की बातें किया करते थे । कभी दिन में सोते नहीं थे । कभी प्रवचन या भाषण जैसी बात नहीं किया करते थे। नहाने के बाद उन्हें कभी शरीर पोंछते नहीं देखा । धोती बदलते ही उनका शरीर सूख जाता था।
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