सिद्ध संत
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः।
अभ्युथानम हि धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम ।।
श्री कृष्ण ने गीता में कहा है की जब जब इस लोक में धर्म की हानि होगी तब तब में धर्म की स्थापना के लिए जन्म लूंगा |
इस लोक में महापुरुषों एवं संतों का जन्म संस्कृति एवं धर्म को जन जन तक पहुंचाने के लिए होता रहा है और आगे भी होता रहेगा | ऐसे महापुरुष एवं संत भले ही हाड मॉस के शरीर में दिखाई देते हों परन्तु वे होते दिव्य हैं | उनमें ईश्वरीय विशेषताएं एवं गुण पूर्ण रूप से विद्यमान रहते हैं | साधारण मनुष्यों की भांति वे प्रकृति के आधीन नहीं होते वरन सम्पूर्ण प्रकृति उनके आधीन होती है | वे सदा ही अपने भक्तों एवं जन साधारण के कल्याण के लिए निरन्तर कार्य करते रहते हैं | यदि किसी मानव में जब दिव्य गुणों की उपस्थिति झलकने लगती है तो साधारण जन मानस का संशय ग्रस्त होना स्वाभाविक है क्योकि उसका सोचने एवं समझने का दायरा बेहद सीमित एवं संकुचित होता है वह बिना गुरु की कृपा के उस से ऊपर नहीं सोच पाता है और इससे उत्पन्न होने वाला भ्रम हमें कभी कभी ऐसे दिव्य गुणों से युक्त महापुरुषों को ईश्वर का रूप जानने एवं मानने से रोकता है ।
जय गुरुदेव ।
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