मनुष्य
#मनुष्य अपने आप में एक #स्वतंत्र इकाई है जो #चेतना शील, #चिंतनशील और #कर्मशील है उसमें स्वतंत्र रूप से सोचने की शक्ति है। यह शक्ति कम से कम शून्य के निकट और ज्यादा से ज्यादा अनंत के निकट है। इसलिए जीवन में उत्थान और पतन की बहुत बड़ी संभावनाएं हैं। जीवन सार्थक करने के लिए अत्यंत कठिन साधना की आवश्यकता है। #मनुष्य अपनी #मानसिक शारीरिक बौद्धिक #मनोवैज्ञानिक #भावनात्मक शक्तियों और वृत्तियों को अन्य सभी ओर से मोड़कर अपने आदर्श की ओर केंद्रित करें तभी आदर्श की #सिद्धि संभव है। अपनी विविध दिशाओं में बिखरी हुई शक्तियों और वृत्तियों का एकीकरण अत्यंत आवश्यक है। यह सहज भी है क्योंकि मनुष्य का नैसर्गिक झुकाव है इस ओर बढ़ने का।
#जय #गुरुदेव।
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