श्रद्धा
श्रृद्धा एवं विश्वास ही शिष्य की एकमात्र सम्पत्ति होती है ओर यही उसका जीवन तत्व है । जिस प्रकार धनी व्यक्ति के लिये धन , वैज्ञानिक के लिए बुद्धि महत्व पूर्ण होती है उसी प्रकार श्रद्धा ओर विश्वास एक शिष्य का सम्पूर्ण जीवन आधार होता है । यदि श्रद्धा है तो सब कुछ है श्रद्धा नहीं तो कुछ भी नहीं है । यह वाह्य क्रियाओं का परिणाम नहीं है। इन्द्रिय ओर मानसिक प्रक्रिया से इसका कोई सम्बंध नहीं है। ईसकी उत्पत्ति अंतरात्मा की सतत सजगता से होती है । जैसे जैसे हम अपने अंतरात्मा की गहराई में उतरते हैं तो हमको आंतरिक प्रकाश का अनुभव होने लगता है ओर श्रद्धा अधिक सशक्त होती जाती है । जहाँ श्रद्धा होती है वहीं शक्ति ओर प्रकाश होता है। श्रद्धा मात्र धार्मिक विश्वास ही नहीं है यह एक आंतरिक धारणा है जो कि अहंकार के पूर्ण समर्पण के बाद ही उत्पन्न होती है ।
जय गुरुदेव।
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